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उत्तर प्रदेश के देवगढ़ में बेतवा नदी के दाहिने तट पर एक मंदिर है जो भारत के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। सुंदर नक़्क़ाशी से सजा दशावतार मंदिर 1500 साल पुराना है जो गुप्त शासनकाल में बनवाया गया था। ये मंदिर देश के गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है।
तीसरी और छठी शताब्दी के बीच भारतीय उप-महाद्वीप के ज़्यादातर हिस्सों पर गुप्त शासक राजकरते थे। उस काल में वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला के क्षेत्र में जो उपलब्धियां हासिल हुईं थीं उसने आने वाले समय में न सिर्फ़ भारत ही बल्कि बाक़ी देशों में भी उच्च मानदंड स्थापित कर दिये थे। दशावतार मंदिर हालंकि अब जर्जर अवस्था में है, लेकिन फिर भी इसमें इन सबकी झलक नज़र आती है।
पत्थर और चिनाई वाली ईंटों से निर्मित ये मंदिर सन 500 का है। ये मंदिर कितना महत्वपूर्ण था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगया जा सकता है कि ये गुप्त काल में देवगढ़ को एरण, सांची, उज्जैन, झांसी, इलाहबाद, पाटलीपुत्र (पटना) और बनारस को जोड़ने वाले राजमार्ग पर स्थित था।
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद ये मंदिर उजाड़ हो गया लेकिन सन 1870-71 में स्थलाकृतिक सर्वेक्षण के दौरान कैप्टन चार्ल्स स्ट्रेहन की नज़र इस पर पड़ी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जनक सर एलेक्ज़ेंडर कनिंघम सन 1875 में यहां पहुंचे तब उन्हें यहा गुप्तकाल के अभिलेख मिले थे। चूंकि उस समय मंदिर का कोई नाम नहीं पता चल पाया था, इसलिये कनिंघम ने इसका नाम “गुप्त मंदिर” रख दिया था।
सन 1899 में पुरातत्वविद पी.सी. मुखर्जी ने इस स्थान का गहराई से सर्वेक्षण किया। उन्हें मंदिर की नक़्क़शियों में विष्णु भगवान की छवि दिखाई दी । उन्होंने इस स्थानीय किवदंती के भी माना जिसमें दावा किया गया था कि मंदिर पर विष्णु के दस अवतार उंकेरे गए थे जो अब दिखाई नही देते हैं। अपनी रिपोर्ट में मुखर्जी ने इसे दशावतार मंदिर कहा | हालाँकि मंदिर को स्थानीय लोग “सागर मढ़” कहते थे।
बहरहाल, बाद की खुदाई में श्री कृष्ण, श्री राम, नरसिम्हा और वामन के रुप में विष्णु के अवतारों की मूर्तियां मिली। सन 1918 में पुरातत्वविद् दया राम साहनी को भी मंदिर की नींव के पास दफन कुछ पैनल मिले। मंदिर के कुछ पैनलों का उपयोग पास में एक दीवार बनाने के लिए भी किया गया था खुदाई के दौरान मंदिर के पलिन्थ के चारों कोनो पर छोटे और चौकोर देवालयों के अस्तित्व का पता लगा। मुख्य मंदिर के साथ साथ ये मंदिर भी उत्तर भारत में पंचायतन शैली का आरंभिक उदाहरण है। यह साबित करता है कि दशावतार मंदिर उत्तरी भारत में पंचायतन प्रकार का सबसे पहला उदाहरण था।
दशावतार मंदिर में देवी-देवताओं, शाही पुरुषों-महिलाओं और आम लोगों की सौ से ज़्यादा मूर्तियां हैं। कुछ मूर्तियां तो अभी भी मंदिर की दीवारों पर देखी जा सकती हैं जबिक बाक़ी मूर्तियां दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय और अहमदाबाद के लालभाई दलपतराय संग्रहालय में रखी हुई हैं। दुर्भाग्य से कुछ मूर्तियां कुछ दशकों पहले चोरी हो गईं थीं।
मंदिर का द्वार अन्य छवियों के अलावा गंगा और यमुना (नदियों) देवियों की छवियों से सजा हुआ है। इनके ऊपर छतरी है और गंगा देवी जहां अपने वाहन मगरमच्छ पर खड़ी हैं, वहीं यमुना देवी कछुए पर सवार हैं। निचले और ऊपरी गृहमुख पर दो पुरुषों की छवियां हैं, एक के हाथ में फूल है और दूसरे के हाथ में माला है। इसके अलावा नृत्य करते एक बौने व्यक्ति या संगीतकार की भी छवि है। ये शायद आगंतुकों का स्वागत कर रहे हैं।
मंदिर के अंदर और बाहर के आलों में मूर्तियां रखी हैं जो विष्णु से जुड़ी कहानियों को बयां करती हैं जैसे गजेंद्र (हाथी) का मोक्ष, नर और नारायण का प्रायश्चित और शेषनाग के सात फनों के साये में लेटे विष्णु।
गर्भगृह के स्तंभ के ऊपर और दीवारों पर विष्णु और लक्ष्मी की छवियां बनी हुई हैं। उनके पास ही शिव, पार्वती, इंद्र, कार्तिकेय, गणेश ब्रह्मा और अन्य देवी-देवताओं की छवियां हैं।
छवियों के अलावा महाभारत और रामायण की घटनाओं के पैनल भी हैं। इनमें राम, लक्ष्मण और सीता के वनवास, लक्ष्मण द्वारा सूर्पणखा की नाक काटना और अशोक वाटिका में सीता को धमकाते रावण जैसी घटनाओं को दर्शाया गया है। इसके अलावा पैनलों पर कृष्ण के जन्म, कृष्ण द्वारा कंस को बालों से पकड़ने और सुदामा का स्वागत करते कृष्ण जैसी घटनाओं का भी वर्णन है।
मंदिर में स्त्री और पुरुष के प्रेमालाप और प्रणय मुद्रा की भी छवियां हैं। कई पैनलों पर अलग अलग भावों में महिलाओं, बच्चों को खेलते, लड़कियों को फूल तोड़ते, एक लड़की को नृत्य करते और पांच लड़कियों को उसे देखते, पांच लड़कियों के बीच एक लड़की को नाचते और बाक़ी को वाद्य बजाते, एक महिला को अपना बच्चा एक व्यक्ति को गोद में देते हुए और उस व्यक्ति को उदासीन खड़ा दिखाया गया है।
सदियों पहले गुप्तकाल में संस्कृति क्या थी, लोगों क्या पहनते थे और किस तरह के आभूषणों हुआ करते थे, ये सब जानने और समझने में ये मूर्तियां बहुत सहायक हैं। उस समय धोती, लहंगा, अनारकली, दुपट्टा और कुर्तें आदि का चलन था। गहनों में पायल, कमरबंद, कंगन, बाज़ूबंध, माला और झुमके पहने जाते थे।
हैरानी की बात ये है कि महिलाओं और पुरुषों का अंगुली में अंगूठी पहनना बहुत आम बात है लेकिन सिर्फ़ विष्णु भगवान को छोटी अंगुली में अंगूठी पहने दिखाया गया है। मंदिर की किसी भी मूर्ति में किसी को हाथ की या पैर की अंगुली में अंगूठी पहने नहीं दर्शाया गया है। महिलाओं को नाक में नथ्नी पहने भी नहीं दिखाया गया है। लेकिन इन छवियों में गरिमा और नफ़ासत दिखाई देती है और साथ ही मूर्तिकारों की दक्षता भी नज़र आती है।
दशावतार मंदिर भारत में मंदिर वास्तुकला के आरंभिक दौर को दर्शाता है। ऐतिहासिक धरोहार वाला ये मंदिर हालंकि बेहद ख़ूबसूरत जगह स्थित है, इसके पास नदी भी बहती है
अगली बार आप जब भी उत्तर प्रदेश की यात्रा पर जाएं तो देवगढ़ ज़रुर जाएं । दशावतार मंदिर से सबसे पास है ।
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